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कोई आके मुझे लौटा दे वो प्यार, वो ममता का गाँव|
जहाँ दिलों में भरी थी छोटी-छोटी खुशियाँ, हर दीं मानो होता था त्योहार||
वर्तमान समय में हम छोटी-छोटी खुशियों से दूर होते जा रहे हैं| हम बड़ी-बड़ी उपलब्धियों मे खुशियाँ तलाशते हैं जो हुंए क्षणिक खुशियाँ देकर जाती हैं| आज कहाँ गया वो नानी का दुलार,दादी की मीठी फटकारआज हम चार जन को परिवार का नाम देते हैं|नानी-दादी को मेहमान कहते हैं|कितने संकुचित हो गये हैं-हमारे मन|आज हम विकास की बात करते हैं|विदेशों में जाकर आजीविका पाने को शान समझते हैं,परिवार से दूरी बडाने को जीवन की उन्नति कहते हैं,बूड़े मा-बाप को व्रडाश्रम में रखकर अपना स्टेटस मेन्टेंन् करते हैं|कहाँ है मेरे भारत का वो परिवार जहाँ एक के अस्वस्थ होने पर पूरा परिवार जुटता था देखभाल को|मन से अपना फ़र्ज़ निभाता था|उसी में खुशी पता था|एक-दूसरे से भावनाओं की मजबूत डोर से बंधा रहता था|
आज हम क्षेत्र में संकुचित होते जा रहे हैं|क्यूँकि हमे अपना विकासा जो करना है|उसी व्यक्ति से निकटता रखनी है जिसमे हमारा भविष्य छिपा हो|आज का लोकप्रिय नारा है-बी प्रॅक्टिकल| हमारा मानना है कि भावनाओं कि ही परवाह करते रहे तो निश्चित तौर पर ज़िंदगी कि दौर में हम पिछर जाएंगे ,आंखिर हमे बड़ा आदमी बनकर नाम कमाना है |
नक़ली खुशियों का खरीददार बनना हैसच में हम अंदर से कितने खोखले होते जा रहे हैं|यही कारण है तेजी से बिखरते परिवारों का|आज हर इंसान स्वयं में सीमित होकर रह गया है |उन्नति क़ी इस नई परिभाषा ने हमे तनाव, दबाव, कुंठा जैसे तोहफे दिए हैं|जो कभी हमसे क़त्ल करवाते हैं तो कभी आत्महत्या|जिससे समाज का ढाँचा असंतुलित हो रहा है| भावनाओं के आपसी जुड़ाव में कमी होने से आज हर व्यक्ति अकेला है जिस ने असुरक्षा क़ी भावना को जन्म दिया है| यूँ भी ताक़त बंद मुठ्ठी में ही होती है|इसलिए एक अच्छे जीवन के लिए एक-दूसरे से भावनात्मक जुड़ाव का होना अनिवार्य शर्त है|और तभी एक अच्छा समाज बनकर उभर सकता है|
लेकिन ये तभी संभव है जब हर व्यक्ति इसके मोल को समझे,विकास क़ी आंधी दौड़ में शामिल ना हो|संवेदनहीनता हर व्यक्ति, हर समाज,और हर राष्ट्र के लिए घातक है|आज हमे समझना होगा कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को छोड़कर हम विकास की किस स्न्तीं दौड़ के लिए अपनी भावनाओं का गला घोंट रहें हैं|
अब हमे वापस लौटना होगा -अपने घर|
1 comment
Sanjay Rana
July 24, 2009 at 2:34 am (UTC 0) Link to this comment
माधुरी कैरा जी
आपने इस लेख में जीवन की दुखती रग पर वार किया पढ़ कर अछा लगा