राम चन्द्र मिश्र का हिन्दी जाल स्थल वर्ड प्रेस के सहयोग से। Best Viewd in FireFox & Chrome Browsers
  • Jul
    22


    संजय राणा हमारे भारत के एक जागरुक नागरिक हैं और उन्होने अपने निम्न विचार इस साइट पर व्यक्त किये थे, जिसको परिमार्जित कर यहाँ पर प्रकाशित किया जा रहा है।

    पता नहीं मेरे देश की सरकार को क्या हो गया है, कसाब ओर उनके मरे हुवे आतंकियों पे देश का पैसा बर्बाद कर रही है जब कि पाकिस्तान ने अपने आतंकियों पर अपनी अदालतों में फेसला सुना कर बा इज्ज्त रिहा भी कर दिए।

    हमारी सरकार किस को दिखाने के लिए कसाब ओर उनके मरे हुवे आतंकियों पे मुकद्दमा चला रही है ओर दिखाने से होगा भी क्या पाकिस्तान को तो सुधरना नहीं, कब तक हम अपने देश के जवान ओर आम लोगो की शहादत देते रहेंगे क्या पकिस्तान से बात चीत करने से ये सब वापस आ जायेंगे?

    पृथ्वी राज चोव्हान ने मोहमद गोरी को १७ बार हराया और १७ बार माफ़ किया लेकिन गोरी ने १८वीं बार धोखे से पृथ्वी राज चोव्हान को हरा दिया और एक बार में ही पृथ्वी राज चोव्हान की आँख निकाल ली क्या हमारी सरकार भी यही चाहती है?

    यह कभी होगा नहीं पर शायद १८ वीं बार भारत को परमाणु बम्बों का सामना करना पड़े ओंर भारत अपनी आँख नहीं बचा पाया तो सरकार व हमारे प्रधान मंत्री क्या करेगें?

    प्रधान मंत्री जी मै भारत का एक आम नागरिक हूँ, मेरी बात पर कृपया ध्यान देना।

    धन्यवाद।

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  • Jul
    18


    ये लेख माधुरी कैरा द्वारा प्रेषित किया गया है, इनके बारे मे अधिक जानकारी इस पृष्ठ पर है।

     

    कोई आके मुझे लौटा दे वो प्यार, वो ममता का गाँव|

    जहाँ दिलों में भरी थी छोटी-छोटी खुशियाँ, हर दीं मानो होता था त्योहार||
    वर्तमान समय में हम छोटी-छोटी खुशियों से दूर होते जा रहे हैं| हम बड़ी-बड़ी उपलब्धियों मे खुशियाँ तलाशते हैं जो हुंए क्षणिक खुशियाँ देकर जाती हैं| आज कहाँ गया वो नानी का दुलार,दादी की मीठी फटकारआज हम चार जन को परिवार का नाम देते हैं|नानी-दादी को मेहमान कहते हैं|कितने संकुचित हो गये हैं-हमारे मन|आज हम विकास की बात करते हैं|विदेशों में जाकर आजीविका पाने को शान समझते हैं,परिवार से दूरी बडाने को जीवन की उन्नति कहते हैं,बूड़े मा-बाप को व्रडाश्रम में रखकर अपना स्टेटस मेन्टेंन् करते हैं|कहाँ है मेरे भारत का वो परिवार जहाँ एक के अस्वस्थ होने पर पूरा परिवार जुटता था देखभाल को|मन से अपना फ़र्ज़ निभाता था|उसी में खुशी पता था|एक-दूसरे से भावनाओं की मजबूत डोर से बंधा रहता था|

    आज हम क्षेत्र में संकुचित होते जा रहे हैं|क्यूँकि हमे अपना विकासा जो करना है|उसी व्यक्ति से निकटता रखनी है जिसमे हमारा भविष्य छिपा हो|आज का लोकप्रिय नारा है-बी प्रॅक्टिकल| हमारा मानना है कि भावनाओं कि ही परवाह करते रहे तो निश्चित तौर पर ज़िंदगी कि दौर में हम पिछर जाएंगे ,आंखिर हमे बड़ा आदमी बनकर नाम कमाना है |

    नक़ली खुशियों का खरीददार बनना हैसच में हम अंदर से कितने खोखले होते जा रहे हैं|यही कारण है तेजी से बिखरते परिवारों का|आज हर इंसान स्वयं में सीमित होकर रह गया है |उन्नति क़ी इस नई परिभाषा ने हमे तनाव, दबाव, कुंठा जैसे तोहफे दिए हैं|जो कभी हमसे क़त्ल करवाते हैं तो कभी आत्महत्या|जिससे समाज का ढाँचा असंतुलित हो रहा है| भावनाओं के आपसी जुड़ाव में कमी होने से आज हर व्यक्ति अकेला है जिस ने असुरक्षा क़ी भावना को जन्म दिया है| यूँ भी ताक़त बंद मुठ्ठी में ही होती है|इसलिए एक अच्छे जीवन के लिए एक-दूसरे से भावनात्मक जुड़ाव का होना अनिवार्य शर्त है|और तभी एक अच्छा समाज बनकर उभर सकता है|

    लेकिन ये तभी संभव है जब हर व्यक्ति इसके मोल को समझे,विकास क़ी आंधी दौड़ में शामिल ना हो|संवेदनहीनता हर व्यक्ति, हर समाज,और हर राष्ट्र के लिए घातक है|आज हमे समझना होगा कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को छोड़कर हम विकास की किस स्न्तीं दौड़ के लिए अपनी भावनाओं का गला घोंट रहें हैं|

    अब हमे वापस लौटना होगा -अपने घर|

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  • Jul
    18

    Madhuri Kaira

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    Ms Madhuri Kaira is among the regular contributors of this site. She has a PhD degree in Psychology and currently working as casual announcer in All India Radio. Her hobbies include Writing Dancing and Acting etc.

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    Distt. Almora

    Uttrakhand

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  • Jul
    17

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