Monday, December 26, 2005
ग्रीनोबल (फ्रांस) यात्रा
मै ग्रीनोबल पर उतरा और चिन्हो का पीछा करते हुये, निकास की और बढे, और भूतल (बाकी का मार्ग भूमिगत है) पर पहुंचते ही पाठक जी सामने से आते दिखायी दिये| 15 मिनट में मैं उनके छठे तल पर स्थित निवास पर पहुंच चुका था|
सब कुछ बढिया और व्यवस्थित था, समस्या एक ही थी, कि थी ही नही, हम लोगो ने साथ खाना खाया और बहुत सी बातें कीं,और फिर वे रात के लिये थोडी दूर स्थित सुशील जी के यहां चले गये, मै थकान अनुभव तो नही कर रहा था पर एक बार नीन्द लगी तो सुबह 6 बजे ही जागे|
सुबह 8 बजे पाठक जी आये उसके बाद पौने दस बजे हम लोग बाहर निकले उनको उनिवेर्सित्य जाना था वहा का सब काम निपटाने, बोले कि लंच में वापस आऊंगा फिर साथ चलेंगे| वे चले गये मै घूमता रहा, मौसम बहुत ठंडा था, मेरे पास ग्लोवेस भी नही थे, 30-40 मिनट बाद मै चर्च के अन्दर भी गया वहा इसाइयों के धर्मगुरू का व्याख्यान चल रहा था कुछ कुछ विशिष्ट प्रकार की ध्वनियों से सुसज्जित. बाहर का तापमान शून्य के पास ही रहा होगा, इसलिये मै वापस आ गया और कुछ पत्रिकाए पढ्ने लगा| 11:30 के लगभग पाठक जी ने फोन किया कि वे लंच मे नही आ पाएंगे, पूछने पर कहा कि 3 बजे तक, 2 बजे मैने कल का रखा दाल चावल खाया और कुछ देर अपने तोशिबा के साथ बिताने के बाद मै लेट गया, सोचा वे आयेंगे तभी उठेंगे, पर वे नही आये मै 6:30 पर उठा और बाहर गया एक दुकान से इंटर्नेट से सन्युक्त होकर ई मेल चेक किये, कल डा त्रिपाठी का जन्म दिन था उन्होने मेरी शुभ्काम्नाओं के लिये धन्यवाद भेजा था| जरमनी और कनाडा से भी एक एक मेल था मैन जब घंटे भर बाद लौटा तो पाठ्क जी मौजूद थे|
Wednesday, December 21, 2005
Tuesday, December 20, 2005
हमारी रोम यात्रा
प्रो सरताज पिछ्ले कई हफ्तो से कह रहे थे इस हफ्ते रोम चलेंगे तो आखिर मै ने भी सोच लिया कि ठीक है इस हफ्ते रोम चलते है, वैसे भी अकेले जाने से अच्छा है कब तक किसी पसन्दीदा शख्श का इंतज़ार करते रहेंगे, वैसे जब मै इटली आया था जनवरी 2005 मे मुझे एक आमंत्रण मिला था, जिसे मैने नासमझी के चलते ठुकरा दिया था, उसके बाद से एक बार मौका मिला जब अगस्त मे भारत जा रहा था, पर उस बार सामान भी काफी था और समय कम
तो हम ने योजना बनायी कि शनिवार को सुबह कमेरिनो से चलेंगे और उसी दिन शाम को वापस आ जायेंगे,
मुझे शनिवार को देर तक सोने की आदत है, और ये आदत पिछ्ले पांच सालों से है, सो शुक्रवार शाम को टिकट ले आये, सुबह 06:35 पर पास के बस स्टेशन से बस लेनी थी उसके बाद कस्तेल्रैमोन्दो
से फब्रिआनो
के लिये ट्रेन और फिर वहां से 8 बजे यूरोस्टार ट्रेन,
मुश्किल से रात कटी कि कहीं सोते ही न रह जायें, और हम 15 मिनट पहले बस स्टाप पर पहुंच गये, खैर सफर शुरू हुआ और खतम भी, इस प्रकार हम
पौने ग्यारह बजे रोमा तर्मिनी
पर उतरे सबसे पहले पता लगाया कि वेटिकन सिटी कैसे पहुंचा जाये, अंततः एक ट्रेनिटालिया स्टाफ से मुलकात हुई और सौभाग्य से वे अंग्रेजी समझ सकती थीं, उन्होनें बताया कि मेट्रो की लाल रंग वाली लाइन ऍ
से हमे जाना है और ओत्ताविएनो स्टेशन पर उतरकर हम वहां पहुच सकते हैं,
वेटिकन सिटी दुनिया का सबसे छोटा देश होने का गौरव रखता है, यह इटली की राजधानी रोम के अन्दर स्थित है और इसकी मुख्य पहचान इसके केन्द्र मे स्थित सैन पियेत्रो नाम के भव्य आहाते से है, जहा लाखो की संख्या मे इसाई समुदाय के लोग एकत्र होकर अपने धर्मगुरू पोप का विशिष्ट अवसरों पर दिया जाने वाला व्याख्यान सुनने आते है
ओत्ताविएनो से सन पियेत्रो पहुंचने के दौरान हम जब रास्ते से गुजर रहे थे तो हमने देखा कि कुछ लोगो ने सोलहवी सदी के वस्त्र धारण किये हुये हैं, और एक कमान्डर उनको हिदायतें दे रहा है, मेरी आंखो के सामने अचानक कहानियो वाले रोम और उसकी सेनाओं का दृश्य जागृत हो आया, बहुत से सैलानी इस दृश्य को अपनो कैमरो मे कैद कर रहे थे तो कुछ वीडियो भी रेकोर्ड कर रहे थे
तभी मेरी नज़र इस चहल पहल से दूर अपनी बायीं तरफ गयी वहा एक खंड्हर सा दिखायी पडा
पहले तो मुझे थोडा अजीब लगा फिर सोचा जब यहा रोम के सैनिक दिखायी दे रहे है तो इस खंडहर का होना भी लाजमी है, लेकिन ऐसा नही था क्योंकि तभी प्रो सरताज ने मुझे पुकारा और बोला मिश्रा जी ये देखिये, क्या बनाया है, मैने कहा, बनाया है? किसने?
और तब मैने देखा कि जो मेरी नज़रो के सामने थी वो चीज प्राकृतिक होते हुए भी अप्राकृतिक और आश्चर्यजनक थी,
पता चला कि अभी अभी इसका अनावरण किया गया है और ये खंडहर नहीं ! ये है, एक पुनर्निर्माण! जिसका रचयिता हमारे सामने अपनी रचना को स्थापित किये हुए था
Friday, December 16, 2005
Venice Tour : सपने सच होते हैं
हम प्रातः 7 बजे हम वेनिस (इटली) के रेलवे स्टेशन पर उतरे, सूरज की
किरणों की प्रतीक्षा मे हम बाहर निकले, सर्दी बहुत ठीक परंतु बाहर जाकर देखा तो तेज बारिश हो रही थी प्लेटफार्म के बाहर न सडक थी न ही मोटर गाडी बस एक समन्दर की धारा और उसमे चलते स्टीमर
आंखे जैसे पलक मारने को तैयार ही नही थी, उन्हे यकीन नही हो रहा था कि किसी शहर मे सारी सड्को और गलियों मेन आवागमन पानी पर होता है, आज जब ये सपना सच हुआ तो खुद को विश्वाश ही नही हुआ
बात बहुत पुरानी है, और ये सपना भी बहुत पुराना है, जब हम अपनी 11वीं कक्षा मे थे और हमारे अंग्रेजी शिक्षक एक कहानी सुना रहे थे जिसका शीर्षक था Merchant of Venice मैने उसे बहुत ध्यान से सुना और कई बार पढा भी. उस किताब मे वेनिस का पूर्ण् विवरण और व्यापार की कहानी थी, जहां के लोगों की दिनचर्या का हर कार्य पनी और नाव से जुडा है, घर के दरवाजे पर समन्दर की लहरे दस्तक देती रह्ती हैं
किताब पढने के बाद मेरी आंखो ने एक सपना देखा कि काश मै ये शहर देख पाता कि ऎसा भी हो सकता है क्या ? और फिर एक दिन हम इटली मे थे, और हमने एक शनिवार को अपनी वेनिस यात्रा शुरू की
रात के 9 बजे प्रारम्भ करके हम सुबह 7 बजे हम वेनिस पहुंच गये, बारिश तेज थी, ज्यों ही हम स्टीमर की ओर बढे और........................... जारी, अगली प्रविष्टि में..............
Sunday, December 11, 2005
सारे जहाँ से अच्छा
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी, वो गुलसितां हमारा
पर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा, सारे...
गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियां
गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनां हमारा
सारे....
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा, सारे...
जैसा कि आप को पता होगा यह गीत सुप्रसिद्ध कवि
मुहम्मद इकबाल ने 1904-1905 में लिखा था
इस गीत का अंग्रेजी शब्दार्थ निम्नलिखित है
Better than all the world, is our
We are its nightingales and this is our garden
That mountain most high; neighbor to the skies
It is our sentinel; it is our protector
A thousand rivers play in its lap,
Gardens they sustain, the envy of the heavens is ours
Faith does not teach us to harbor grudges between us
We are all Indians and
इंटेर्नेट पर इस गीत की मीडिया फाइल की खोज करते
करते मैने एक टिप्पणी पायी जिसको मैं अवश्य
उद्ध्रित करना चाहूंगा
Bismil@Delphi comments :-
जनाब कहते हैं कि यह इकबाल के “तराना-ए-मिल्ली” से बहुत सफाई से चुराई गयी परोडी है
उनके अनुसार, वास्तविक गीत है,
चीन ओ अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा,मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा
The real beauty of the first verse is that it turns around Iqbal's arguably communal and national hymn into a cry of of the oppressed and anguished that is neither communal nor chauvinist nor nationalist, but internationalist.वे कहते हैं कि इकबाल की एक दूसरी नज्म “तराना ए हिन्द” से लिये गये खंड भी पहचाने जा सकते हैं विशेषतः भारतीयों के लिये, जो जानते हैं “सारे जहां से अच्छा” ऎ आब ए-रुद-ए गंगा, वो दिन याद है तुझको,उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा
जिसके लिये परोडी है: सडकों पे घूमता है अब कारवां हमाराऔर आखिरी पंक्ति जो बहुत से लोग नहीं जानते:इकबाल कोई महरुम, अपना नहीं जहां में,मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहां हमारा
या फिर “तराना-ए-मिल्ली” से जो इस तरह से है,ऎ गुलिस्तां-ए-अन्दालस, वो दिन याद है तुझ को,था तेरी डालियों में जब आशियां हमारा ?
Overall, it seems to him that the song takes a somewhat dim view of the lofty and grandiose nationalism of Iqbal by presenting some home-truths about real present day life. आपके क्या विचार हैं?

